एक कहानी टुकड़े टुकड़े गैंग की.

(This is a compilation of my articles that I wrote three years back. Still, I find them relevant)
(दिल्ली में #जेएनयू में देशद्रोही नारे लगने की घटनाओं से उथल-पुथल मची हुई है। यद्यपि विश्वविद्यालय में कक्षाएँ लगभग सामान्य ढंग से चल रही हैं क्यूंकि अधिकतर छात्र-छात्राएँ तथा प्राध्यापक ऐसा चाहते हैं। इस संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया भी सराहनीय है। फिर भी कुछ पत्रकार और नेता इसे थमने नहीं देना चाहते हैं ।जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष राजनैतिक दल हैं। इस आक्टोपस की सबसे मजबूत और खतरनाक भुजा हैं, मीडिया! मीडिया को भ्रम है कि वह सरकारें बनानेे और गिराने में सक्षम है। )

दिल्ली में #जेएनयू में देशद्रोही नारे लगने की घटनाओं से उथल-पुथल मची हुई है। यद्यपि विश्वविद्यालय में कक्षाएँ लगभग सामान्य ढंग से चल रही हैं क्यूंकि अधिकतर छात्र-छात्राएँ तथा प्राध्यापक ऐसा चाहते हैं। इस संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन का रवैया भी सराहनीय है। फिर भी कुछ पत्रकार और नेता इसे थमने नहीं देना चाहते हैं ।

इस पूरे प्रकरण में से कुछ बातें निकल कर सामने आई हैं । एक बात तो निश्चित है कि इस प्रकार की गतिविधियाँ और नारेबाजी जे.एन.यू. के लिए नई बात नहीं है । जिसे भी जेएनयू के बारे में जरा भी पता है , वह यह जानता है। अभिव्यक्ति की आजादी बढ़ते-बढ़ते देश विरोध तक चली गई । जेएनयू के पढे़ लिखे लोग, उनके पैरोकार , स्वनामीधन्य बुद्धिजीवी ‘नेशन‘ और स्टेट‘ में अंतर भूल ही गए हैं। भूल तो वे बहुत कुछ गए हैं , जैसे भाजपा, #मोदी , प्रधानमंत्री के पद और भारत यह चारों अलग-अलग हैं। भाजपा विरोध को उन्होंने भारत विरोध तक खींच दिया है ।

‘राष्ट्रद्रोह‘ की परिभाषा में उलझा कर न्यायालय के फैसलों के विरोध तथा भारत के टुकड़े करने के मंसूबों पर से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है। आपत्तिजनक नारे लगाने वालों के सरगना के काॅल रिकार्ड चेक करने से सामने आ गया है कि वह पाकिस्तान, बंग्लादेश तथा अरब देशों के संपर्क में था। आई. बी. की रिर्पाेट के आधार पर प्रशासन को पहले ही इसकी जानकारी थी । फिर भी #हाफिज सईद के कथित ट्विटर एकाउंट के गलत होने का हल्ला उठा कर उस पर से ध्यान हटाने की पूरी कोशिश चल रही है । इसी तरह से #कन्हैयाकुमार की गिरफ्तारी के विरोध की भी लचर कोशिश चल रही है । उसने तीन दिनों के अंदर न जाने कितने भाषण दे दिए थे । निर्दोष जेल मे साजिशन डाल दिया हो ।

आमतौर पर ऐसी स्थिति में ऐसा ही होता है कि चतुर अपराधी दल में से छोटी मछली को जाल में फंसने देते हैं , जिससे असली अपराधी से ध्यान हट जाए । इसी तरह पुलिस भी एक सामान्य सी कोशिश कर रही हैं कि जो भी कड़ी पकड़ मे आए उसे पकड़ो और वहीं से गुत्थी के सुलझने के तार निकलने लगेंगें । इसको अन्य गिरफ्तारियों में पुलिस के इच्छा शक्ति के अभाव के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं । कन्हैया रिमांड पर है । रिमांड सजा नहीं होती है । वह जमानत पर छूट भी सकता है । परंतु बिना पेशी की प्रतीक्षा किए इस किस्म का शोर शराबा भी ध्यान हटाने की साजिश ही है । इसी तरह यद्यपि विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी आंतरिक जाँच में कन्हैया कुमार को दोषी पाया है, फिर भी टेप मे छेड़छाड़ के आरोप मीडिया वाले लगातार लगा रहें हैं। कन्हैया ने गिरफ्तारी के बाद संविधान में आस्था तथा नारेबाजी से दूर रहने का जो बयान दिया है, उसे भी उसकी भूतकाल में निर्दोष होने के सबूत के रूप मे पेश कर रहे हैं न कि माफीनामे के रूप में । इसी प्रकार न्यायालय के अन्दर हिंसा की दुर्भाग्यपूर्ण घटना की बिना घटना क्रम की जाँच के सरकार तथा न्यायालय के नियत पर प्रश्न चिन्ह के रूप में पेश किया जा रहा है । न्यायालय में जो हुआ उसमें एक प्रश्न और भी विचारणीय है । ऐसा माना जाता है कि जज किसी की राय से प्रभावित हुए बिना अपना निर्णय सुनाए। ऐसी स्थिति में कन्हैया के समर्थक छात्र तथा अध्यापक इतनी बड़ी संख्या में क्या शक्ति प्रदर्शन के लिए वहाँ पहुँचे थे ? यदि ऐसा है तो झगड़े को निमंत्रण किसने दिया ?

यहाँ पर ध्यान रहे कि न्यायलय में झगड़े की शूरूआत ही इस बात से हुई थी कि वकीलों को अंदर खड़े होने की भी जगह नहीं बची थी । ध्यान बटाने की हद तो यह थी कि #सीतारामयेचूरी बोले कि नारेबाजी का कोई कैसेट हो ही नहीं सकता क्यूंकि जे.एन.यू. में सी.सी.टी.वी. ही नहीं है ।

सुधि पाठकों को यह सब कहने के पीछे एक ही निवेदन है, सच-झूठ, व्यर्थ -सार में फर्क अपने विवेक आधार पर करें और इसे कुछ थोडे़ से लड़कों की नादान, प्रभावहीन कोशिश न कहें। क्यूंकि एक तो अगर इन्हें रोका न गया तो यह संख्या बढ़ेगी ही घटेगी नहीं । दूसरे आज जो छात्र हैं यदि कल वो किसी प्रभावशाली पदों पर पहुँचेंगें तब इस विचारधारा के साथ वे क्या करेंगें ईश्वर ही जानता हैं। याद रखें भारत एक राष्ट्र के रूप में मजबूत रहेगा तब ही तक अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता भी रहेगी ।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष राजनैतिक दल हैं। हम सभी यह जानते हैं कि भारत में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के अतिरिक्त, जो पूर्ण बहुमत के अभाव में निरंतर बाधित होती रही, कोई भी गैर कांग्रेसी सरकार बनकर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी है। हमेशा से ही कांग्रेस किसी वजह से सत्ता से बाहर हुई भी तो सरकार पर उसका प्रत्यक्ष या परोक्ष नियंत्रण रहा है। चाहे वह चरण सिंह की, चंद्रशेखर की, मोरारजी की या विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार हो, सभी कमोबेश कांग्रेस की पैदाइश थीं। परिणामत: प्रशासन और नीतियां कांगे्रस से दूर नहीं हुई। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार कांग्रेसी संस्कृति से उपजी सरकार तो नहीं थी लेकिन पूर्ण बहुमत के लिए जिन दलों पर निर्भर थी, उनकी जड़ें कांग्रेस में थीं। पहली बार ऐसा हुआ है कि एक पूर्ण गैर कांगे्रसी सरकार वह भी ऐसे प्रचंड बहुमत के साथ आई। वहीं कांग्रेस को राज्यवार पराजय का मुंह देखना पड़ रहा है। एक-एक करके उसके गढ़ ध्वस्त होते दिखाई दे रहे हैं। राहुल गांधी के हाथ नेतृत्व आने के बाद से आसार अच्छे नहीं नजर आ रहे हैं। शेष राजनैतिक दलों में कोई ऐसा नेता नहीं दिखता जिसकी पूरे भारत में अपील हो, नेता तो क्या कोई दल भी ऐसा नहीं है। नीतीश, मुलायम या जयललिता ऐसी कोई महत्वाकांक्षा भले सही पाल बैठें लेकिन अपने मन में वे भी जानते हैं कि देश के शीर्ष नेतृत्व तक उनके पहुंचने का आसरा जोड़-तोड़ ही है। वह भी जब भाजपा अपनी ही गलतियों के नीचे दब जाए।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि कांग्रेस ने साठ से भी अधिक वर्षों के शासनकाल के दौरान सभी स्तरों पर अपने समर्थकों को भर दिया है। लालच या भय से बुद्धिजीवी, शिक्षाविद् प्रशासक हर तबके में वह ही अपना अस्तित्व संभाल पाया जिसने झुकना स्वीकार किया। आजादी के बाद कांग्रेस (जवाहर लाल नेहरू) की पहल पर जेएनयू की स्थापना हुई थी। इसे कांग्रेस के ‘थिंक टैंक ‘ की तरह बनाया गया था। उद्देश्य था कि यहां से पालिसी मेकर्स निकलें और देश को कांग्रेसी विचारधारा के साथ चलाएं। स्वाभाविक रूप से कंाग्रेस उस समय जन आंदोलन से निकली पार्टी थी इसलिए उसमें बौद्धिकों की कमी थी। अत: कम्यूनिस्टों से समझौता करके ऐसे काम कांग्रेस ने उनको सौंप दिए। दो भागों में मलाई बांट ली गई। सोच तुम संभालो, शासन हम संभालेंगे। यद्यपि ऐसा नहीं था कांगे्रस में। उस समय भारतीय साम्यवादियों के चाल, चलन और नियत को पहचानने वाले नहीं थे। बहुत से ऐसे कांग्रेसी थे, किंतु उनकी आवाज दबा दी गई। बहुत नाम लेने लायक तो इस लेख में जगह ही नहीं हैं, किंतु दो उदाहरण मैं देना चाहूंगी। पहला नाम है भारत के पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा का, जिन्होंने अपने भाषण में कहा था कि भारत के कम्यूनिस्ट केवल अपने पते से भारतीय हैं, चरित्र, विचारों और निष्ठा से नहीं। दूसरा नाम प्रतिष्ठित सामाजवादी व गांधीवादी नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण का है, उनके समग्र रचना संकलन टुवाडर्स टोटल रिवोल्यूशन (जो कि उनके जीवनकाल में ही प्रकाशित हो गया था) की प्रस्तावना में उन्होंने भारतीय कम्यूनिस्ट के चेहरों पर से पर्दा उठाया हैं। परंतु दुख की बात यह है कि ये आवाजें बड़ी चतुराई से दबा दी गई। हालात ऐसे बिगड़े कि इन वामपंथियों ने भारत में ज्ञान के संपूर्ण जगत पर ही अपना कब्जा स्थापित कर लिया। सरकारी खर्चे पर ढेरों संस्थान, सोसाइटी, विभाग बनाए, जिनका काम ही इनकी विचारधारा को पोषित करना था। भारतीयता को पूर्णत: नकार देने वाले ये स्वयं स्थापित विद्वान स्वयं ही अवार्ड पुरस्कार बांटते, स्वयं ही एक दूसरे की समीक्षा करते और स्वयं ही एक दूसरे की पीठ थपथपाते। इस सबमें कांग्रेसी सरकारों का पूर्ण समर्थन तथा सहयोग प्राप्त था। हालात यहां तक बिगड़े कि नए आने वाले बच्चे व भारतीय शिक्षित वर्ग वामपंथियों को ही ज्ञान की मुख्यधारा मानने लगा। इससे हटकर अथवा भारतीय जड़ों से जुड़ा हुआ कार्य अगर किसी को करना हों तों सिवा विदेश का रास्ता पकडऩे का कोई चारा नहीं रहता, उसे भी बाहर भले ही मान्यता मिले, भारत में तो कोई संभावना ही नहीं थी। ऐसी स्थिति हर क्षेत्र में थी, चाहे वह साहित्य हो या समाजिक विज्ञान हों, मानविकी हो, अथवा कला या सिनेमा, थिएटर हो। धीरे-धीरे विश्वस्तर पर भारत पिछड़ता चला गया। सत्यजीत रे के बाद कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का सिनेमाकार नहीं हुआ। रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद कोई नोबेल न पा सका। कहां तक गिनाएं, दिल दुखता है। लेकिन भारत में जरूर एक एक को अवार्ड, पुरस्कारों की कोई कमी नहीं थी। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो विश्व स्तर पर हमारा बौद्धिक विदूषकों का समूह बनकर रह गया।

जेएनयू ऐसे लोगों की फैक्टरी है, इसका विधान भी इस प्रकार बना है कि अगर कभी कोई विपरीत सरकार आ जाएं तो आसानी से इसको हिला न सके। आज जो पुलिस जेएनयू के अंदर नहीं जा सकती है, उसकी भी यही वजह है। वैसे तो सभी सरकारी विश्वविद्यालयों में शुल्क बहुत कम होता है, लेकिन जेएनयू की तो बात ही अलग है। वहां न केवल शिक्षा शुल्क अपितु रहना खाना भी लगभग मुफ्त है। इस तरह वहां सरकारी पैसे पर वामपंथ का कैडर खड़ा किया जाने लगा। गरीब, दूरदराज का मेधावी किंतु दुनिया से अनजान छात्र जब वहां पहुंचता है तो एक प्रकार के मायाजाल में फंस जाता हैं। अब वामपंथी कितने भी कांग्रेस के सहयोगी हो जाएं, जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री गुलजारी लाल नंदा कहते थे कि उनकी निष्ठा कभी भी भारत के साथ नहीं थी। नतीजतन समय के साथ जेएनयू भारत विरोधी गतिविधियों का अड्डा बन गया है।

ऐसा नहीं है भारत को तोडऩे के नारे यहां पहली बार लगे हैं। नया तो यह हुआ कि इस बार कुलपति और केंद्र सरकार इनकी अपनी नहीं थी, लोगों में विरोध का साहस था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बातें करने वाले भारत और भारतवासियों के अस्तित्व को चुनौती देते हैं। दंतेवाडा में शहीद हुए जवानों की मौत का जश्न मनाने और न्यायालय द्वारा सजायाफ्ता देशद्रोह के अपराधियों को समर्थन देना उस ही संस्कृति का हिस्सा है। इनको किसी भी तरह से रोकना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है कि इसका पूरा तंत्र बना हुआ है जो दशकों से कांग्रेसी पैसों और सरकारी वित्तीय सहायता पर फलफूल रहा है। देश को जकड़े हुए इस ऑक्टोपस की कुछ अन्य भुजाओं पर चर्चा करते हैं
भारत में एक तंत्र समाज में हर स्तर पर कार्यरत है और निरंतर निहित स्वार्थों के लिए देश में टकराव की स्थिति पैदा कर रहा हैं जिससे किसी भी प्रकार से चुनी सरकार को ध्वस्त कर सकें। बहुमत की सरकार असफल करने की कोशिश में निरंतर देश को असफल करते जा रहें हैं । इस आक्टोपस की सबसे मजबूत और खतरनाक भुजा हैं, मीडिया! मीडिया को भ्रम है कि वह सरकारें बनानेे और गिराने में सक्षम है। पिछले कुछ दिनों मीडिया का जो रूप दिखाई दिया हैं, उसमें यह तो स्पष्ट है कि लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ ढहने के कगार पर है और शेष तीन स्तम्भों पर ही लोकतंत्र को संभालने की पूरी जिम्मेदारी है। यह स्पष्ट है कि हरेक मीडिया हाउस किसी न किसी ग्रुप में हैं और एक से एक वरिष्ठ और काबिल पत्रकार बेशर्मी से अपना खेमा चुनकर उसका प्रचार-प्रसार कर रहें हैं । निष्पक्षता और न्याय शब्द शायद उनके शब्दकोष से निकल ही चुके हैं।

अपने अपने खेमे के प्रचार-प्रसार की दौड़ में यह आपस में उलझने से बाज नही आते हैं। पिछले कुछ दिनों से चैनल्स की बीच जारी वाक् युद्ध ने तो शालीनता के सभी पर्दे उतार दिए हैं। जनता भी जिसकी बात उसे पसंन्द आती हैं, उसे सही ठहराती है, शेष को प्रतिबद्धताहीन। एक चैनल ने तो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हुए दूसरों को इतना लताड़ा कि अपनी स्क्रीन ही काली कर डाली, जवाब में दूसरे चैनल ने न केवल अपनी सत्यता सिद्ध की अपितु दूसरे के पुराने कांड फिर से उधेड़ दिए। देशद्रोह और देशप्रेेम की इस महाभारत में पत्रकार रूपी योद्धा किसी पक्ष में खड़े जरूर हैं किंतु इस संदर्भ में कृष्ण की बात भी सच दिखती है कि महाभारत में दिखता तो हर कोई किसी न किसी पक्ष के खड़ा, किंतु युद्ध हर कोई अपना ही लड़ रहा है।

‘‘पेड मीडिया‘‘ एक ऐसा शब्द है जो बरसों से अस्तित्त्व में है, सभी जानते हैं कि अपने प्रचार-प्रसार और जनमत बनाने के लिए उपयोगी समाचार कुछ पैसे खर्च करके किसी भी अखबार, चैनल में चलाए जा सकते हैं। चुनाव के दिनों में चुनाव आयोग इसे लेकर बहुत सख्त और सतर्क होता हैं, फिर भी यह सब चलता रहता है । किंतु इसका सबसे भंयकर और देशद्रोही रूप अब सामने आया है। पिछले दिनों राॅ (रिसर्च एण्ड एनालिसिस विंग, भारत सरकार) से अवकाश प्राप्त एक अधिकारी टी.वी. चैनल पर राष्ट्रद्रोह की बहस में भाग ले रहे थे। उन्होने कहा कि याकूब मेमन की फाँसी होने से पहले तमाम अखबारों और चैनलों पर चलने वाली बहस पूर्णतः पूर्व नियोजित और प्रायोजित थी। इस काम के लिए दस से अधिक पी.आर.संस्थानों को मोटे पैसे दे कर नियुक्त किया गया था,जिसका बजट कुछ हजार करोड़ तक पहुंच गया था। फाँसी की सजा का विरोध करने वाले तथाकथित एक्टिविस्ट तथा समाज सेवियों के पास तो इतने पैसे आए ही कहाँ से, मेमन परिवार भी कितना ही धनी क्यों न हो इतना बड़ा अभियान चलाने लायक नहीं है। निश्चित ही इतना पैसा बाहरी देशों अथवा असामाजिक तत्वों ने ही खर्च किया है। अब इसमें एक पेंच और फंसता है! सबको पता था कि सरकार मेमन को फाँसी तो देकर रहेगी, फिर यह अभियान क्यों ? शायद इसलिए कि इस ही बहाने देश में सरकार विरोधी तथा विदेशों में भारत विरोधी हवा तैयार की जा सके। दूसरा जो और भी खतरनाक बिंदु है वह यह है कि क्या रातों रात अदालत खुलवाने वाले न्याय के तथाकथित रक्षक, टी.वी. स्क्रीन पर हाँफ हाँफ कर मेमन की फाँसी को विरोध करने वाले और अफजल हम शर्मिंदा हैं कि नारे लगाने वाले एक ही गंगा में हाथ धो रहे हैं । एक सवाल यह भी है कि नगण्य दर्शक संख्या वाले अंग्रेजी चैनल किस तरह करोड़ो का खर्च उठाते हैं।

पत्रकारों और कारपोरेट घराने के संबंधों के कई उदाहरण सामने हैं । लेकिन यह सब आज भी अपने को सामान्य व्यक्ति से अधिक ज्ञानी और नैतिक प्रदर्शित करते हैं । इनके कार्यक्रमों में इन ही की तरह पूर्वाग्रहित बुद्धिजीवी आते हैं और इसके बाद विरोधियों की खिल्ली उड़ाने का सिलसिला चल पड़ता हैं। सदन में दिए गए स्मृति ईरानी के भाषण का जब कोई काट न ढूंढ सके तो सब एक सुर में एक साथ पूरे भाषण को एक अभिनेत्री की नौटंकी कह कर खारिज करने लगे। ये ही पत्रकार आमिर खान और शाहरूख खान के बयानों को महिमा मंडित करते थकते नहीं थे। एक ही बात को बार बार एक स्वर में कह कर ख़ास किस्म का माहौल बनाया जा रहा हैं। जिस प्रकार एक ही लय में ये एक साथ विमर्श की दिशा बदलते हैं, उसमें साफ लगता है कि ये एक टीम का ही भाग है। इनका अभूतपूर्व ताल-मेल देख कर समझ नहीं आता कि इस पूरी नौटंकी में कितना पैसा खर्च हुआ है, और साथ ही जब यह सोचें कि इतना पैसा कौन और किस नियत से खर्च कर रहा है तो हैरानी होती है। मुद्रा और विमर्श की दिशा बदलने का एक ही उदाहरण पूरे मुद्दे को समझने के लिए बहुत है। कुख्यात इशरत जहाँ की मृत्यु के बाद सबका एक ही रोना था कि अल्पसंख्यक समुदाय की एक निर्दोष युवती की क्रूर हत्या हुई है। इसके बाद हेडली का बयान आया कि वह आंतकवादी थी। तुरंत बात आई हेडली जैसे आंतकवादी की बात सच होगी या हमारी। तब तक नया मोड़ आया कुछ पूर्व अधिकारियों ने कहना शुरूकर दिया कि इशरत से संबधित कुछ दस्तावेज केंद्र सरकार के आदेश पर हटाए गए थे। तुरंत बहस निर्दोष बनाम अपराधी से मोड़ कर एनकांउटर बनाम हत्या पर ले आई गई। एक अखबार ने हेडिंग लगाई कि पूर्व अधिकारी ने इशरत पर अपने बयान से पल्ला झाड़ा। देख कर लगता है कि अधिकारी अपने बयान से मुकर गया, लेकिन पढ़ो तो खबर कुछ और ही थी। बेरमूला की फेसबुक वाल पर वह साफ साफ अपनी कुंठा के लिए येचुरी को जिम्मेदार ठहराता है परंतु फिर भी लगातार केंद्र सरकार की जिम्मेदार ठहराई जा रही हैं। अपनी सुविधा से खबर का चयन करना और उस पर विमर्श निर्देशित करना तो मानों इनका जन्मसिद्ध अधिकार ही है ।पिछले एक वर्ष में हम देखते हैं कि बीजेपी शासित प्रदेशों में एक के बाद एक विघटनकारी घटनाएं घटती हैं क्या हमारे मूर्धन्य पत्रकार इसमें भी कोई पैटर्न नहीं ढूंढ पा रहे हैं ? ऐसी स्थिति में शक करने के लिए इनकी नियत ही बचती है।

देशद्रोह-देशप्रेम की बहस में माहौल बनाने की धुन में आभिजात्य वर्ग के मंहगे अंग्रेजी स्कूलों में पढे, ये पत्रकार और बुद्धिजीवी भारत से इतना कट गए कि ये भूल ही बैठें हैं कि इंडिया से विपरीत भारत आज भी अपने राष्ट्रीय ध्वज और सेना के लिए हदय में असीम आदर ओर प्रेम रखता है । ज्यूंही यह बहस भारत के टूकड़े करने और राष्ट्रीय ध्वज की उपेक्षा की ओर घूमी तो मानों शिशुपाल के सौ अपराध पूरे हुए हों। जनता जनार्दन के सब्र का बांध टूट गया। सारे देश में एक स्वर में विरोध हुआ जो पिछले रविवार को पूर्व सैनिकों की अगुआई में निकले राजघाट से जंतर मंतर तक लेते जुलूस के रूप में प्रकट हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि अंधे टी.वी. स्क्रीन वाले पत्रकार समूह ने अपनी दृष्टि का अंधत्व देश पर थोपने की कोशिश की और इस जुलूस को कवर ही नहीं किया, लगभग बायकाट ही कर दिया ।

लेकिन शायद ये खबरनवीस ने यह भूल गए कि लोकतंत्र मे भगवान जनता हैं , इस ही लिए हम जनता जनार्दन कहते हैं। आपात काल में जब के भय के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने टेक दिए थे और गोयनका समूह के अतिरिक्त हर पत्रकार वह ही लिखता था जो कांग्रेस जनता को दिखाना चाहती थी, तब भी जनता ने झूठ की ओढ़नी के पीछे छिपे हुए सच को देख लिया था। आज भी धन के दबाव में आकर खबरनवीसी कितनी भी मैली हो जाए जनता उसके पीछे छिपे हुए सच को देख ही लेगी। यहाँ पर भारत की सीधी-सादी जनता की एक चतुराई और दिखती है, पिछले पंद्रह दिनों में कुछ चैनल की रेटिंग जैसे गिरी है और कुछ की जैसी उठी है उससे भी यह ही पता चलता है कि जनता सब कुछ जानती हैं और माफ करने के मूड मे नहीं हैं । आखिर भारत जनता का ही है और जनता ही इसकी रक्षा करेगी।

बरसों का फैला हुआ मकड़जाल है, इसका टूटना जरूरी है । लेकिन जरूरत है संयम तथा सब्र की और इससे भी जरूरी है यह सुनिश्चित करना है कि एक मकड़जाल टूट के दूसरा मकड़जाल न बन जाए ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *