खोखले नारे-छीजता पर्यावरण


कुछ दिन हुए एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में बहुत से बच्चों से संपर्क हुआ, विषय था ‘पर्यावरण और उसका संरक्षण’. बच्चों में पर्यावरण संरक्षण को लेकर जागरूकता, उत्साह और उत्तरदायित्व की भावना देखकर मन को बड़ा संतोष मिला. लगा कि जल, धरती और असमान की जो दुर्गति हमारी पीढी ने अज्ञान तथा अदूरदर्शिता के चलते कर दी है, कम-से-कम बच्चे तो उसे आगे नहीं बढ़ेंगे. इसके बाद बच्चों से बातचीत का सिलसिला आरम्भ हुआ. जितने बच्चे थे उतनी ही उनकी जिज्ञासाएं थीं. कक्षा पांच के एक छात्र का मासूम प्रश्न कि अगर वह अपने फ्लैट कि बालकोनी के फर्श पर लगा हुआ टीले उखड दे तो ‘वाटर हार्वेस्टिंग’ हो सकती है या नहीं. दूसरी कुछ बड़ी छात्र का कहना था कि कोआला को बचने के लिए कुछ-न-कुछ तो करना ही चाहिए. उसका भी सवाल था कि इसके लिए एक निर्धारित दिन पर कली पट्टी पहनना या फसबूक पर सन्देश प्रसारित करना इसके लिए कारगर होगा या नहीं. एक और बच्चे ने किसी राजनेता के सामान अत्यंत जोश से बताया कि अब वह नदी-जल प्रदूषण सहन नहीं करेगा. लेकिन इसके लिए क्या करना होगा, उसे भी पता नहीं था. एक और मासूम का प्रश्न था कि जब वह अपने घर में जैविक कूड़ा अलग कूड़ेदान में इकट्ठा करता है तो कूदेवाला भैया उन्हें आपस में मिला क्यों देता है. इस तरह के तमाम प्रश्न सुनकर मन उदास हो गया. लगा कि हम बड़े फिर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं. उन बच्चों में से कितनों ने नहीं जल में सीवर के नाले छोड़ने, अधजले शव बहाने या रासायनिक कचरा बहाने में योगदान किया होगा? क्या हरित ईंधन का प्रयोग वे सुनिश्चित कर सकते हैं? कागज़ को पुनर्प्रयोग में लेन के लिए संयंत्र लगाना तथा उसका वितरण क्या उनके वश में है? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘पर्यावरण संरक्षण’ के मुद्दे पर भी हम उन ही पुरानी सतही हरकतों का जल नहीं बुन रहे हैं. इस तरह तो हम उन्हें भी पाखंड और दिखावे की विरासत दे बैठेंगे. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि एक हद के बाद संवेदनशीलता भी असंवेदनशीलता में बदल जाती है. कहीं ऐसा न हो कि ये बच्चे हमारे प्रयासों का खोखलापन पहचान जाएँ और बड़े होकर जब तक कुछ करने में समर्थ हो, तबतक इन मुद्दों के प्रति उदासीन हो जाएँ.

पर्यावरण को बचने के लिए समाज के हर सदस्य को अपने स्तर पर यथासंभव प्रयास करने कि आवश्यकता है. बच्चों को भी उसमें शामिल करना अनिवार्य है. परन्तु इसके लिए उन्हें वे उपाय बताए जाएं जो कि उनके वश में हों और इसी माध्यम से उनमें पर्यवाराकं के प्रति संवेदनशीलता और जागरूकता ली जाए. दैनिक जीवन में किस प्रकार उर्जा और जल के अपव्यय को रोका जा सकता है, इसके छोटे-छोटे किन्तु व्यावहारिक उपायों से उन्हें परिचित करने कि आवश्यकता है. उन्हें बताएं कि थोड़ी दूरी के लिए कार या स्कूटर के स्थान पर साइकिल से या पैदल जाना न केवल पर्यावरण अपितु उनके स्वस्थ्य के लिए भी उत्तम है. कंप्यूटर प्रिंटआउट निकलते समय कागज़ को दोनों तरफ से प्रयोग करके, छोटे-छोटे काम के लिए कागज़ की पूरी शीत के स्थान पर छोटे टुकड़ों का प्रयोग करके, व्यर्थ टी. वी. और रेडियो न चलने देकर, हर समय कंप्यूटर पर ऑनलाइन रहने को प्रतिष्ठा की बात न मानकर, कभी-कभी ए. सी. और हीटर से बहार निकलकर खुले वातावरण में रहकर, नल और शावर बहने न देकर, कागज़ के रुमाल मोड़-मोड़कर न फेंककर, कागज़ और प्लास्टिक के बर्तनों का कम-से-कम प्रयोग करके, वे पर्यावरण के संरक्षण में योगदान कर सकते हैं. बाल पेन की जगह स्याही-वाले पेन का प्रयोग करके एक बच्चा न जाने कितनी प्लास्टिक का अपव्यय रोक सकता है. सुदूर ऑस्ट्रेलिया में कोआला को बचने कि चिंता में मग्न बच्चे को यह सिखाने कि आवश्यकता है कह देखा देखी में अजीबो-गरीब प्रजाति के जानवरों को पालतू बनाकर घर में बंद रखना भी एक प्रकार की क्रूरता ही है. सड़क पर फैले हुए पोलिथीन के थैलों को खाकर हर साल मरने वाले सैकड़ों जानवरों से सहानुभूति रखते हुए सड़क पर कचरा न फेंकना ज्यादा प्रभावी होगा.

इस प्रकार की अनेक बातें हैं जो बच्चों में पर्यावरण संरक्षण के संस्कार विकसित कर सकती हैं. इस सबसे बढ़कर कारगर एवं आवश्यक है कि हम उन्हें अपनी संस्कृति के उस पक्ष से परिचित कराएं जहाँ प्रकृति को देवी, धरती को माँ, नदिओं को प्राणदायिनी शक्ति और वृक्षों को पुत्र के सामान मन जाता है. पर्यावरण संरक्षण हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है. आज सभी पर्यावरणविद एक स्वर में मानते हैं कि अपनी सुख-सुविधा के लिए अंधे होकर प्राकृतिक संसाधनों का ताबड़तोड़ विचारहीन दोहन ही इस विकराल समस्या की जड़ है. ऐसे में यदि मितव्ययता एवं ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखी; के संस्कार बचपन में ही सिखाये जाएं तो ये बच्चे बड़े होकर समग्र रूप से ज़िम्मेदार नागरिक बनेंगे. बच्चों के साथ बात करके ऐसा लगा कि जागरूक और ज़िम्मेदार बनाने की ज़रुरत इन बच्चों से अधिक हमें है. समय आ गया है कि हम खोखले नारों और सतही उपायों को छोड़कर अपने-अपने स्तर पर कुछ ठोस प्रयास करें, जो कि समस्या के एक पहलू को लेकर इसका निदान एवं समाधान प्रस्तुत करें.

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